Friday, August 8, 2008

"गंगा तेरा पानी अमृत"

"शिवजी की जटा छोड़ी बगदी जो आई, हिमवंती गुणवंती मेरी गंगा माई" गंगा का नाम लेते हे पूरे मन मस्तिष्क और शरीर में एक पवित्रता का संचार होता है. महाकवि तुलसीदास ने तो गंगा की महिमा में "गंगाष्टक" की रचना की थी. पंडित जगन्नाथ जी ने "गंगालहरी" गाकर गंगा की स्तुति की, अभी भी गंगा की आरती निरंतर की जाती है. वेदों के अनुसार गंगा देवनदी है, स्वर्ग में देवता इसे अमृत कहते थे. राजा सगर के साठ हज़ार पुत्रों का उद्धार करने के लिए उनके ही वंशज भगीरथ कठोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर उतार लाये. गंगा का नाम भागीरथी भी है. कहते हैं कि गंगा प्रारंभ में प्रचंड रूप में थी इसलिए शिवजी ने इसे अपनी जटा में संभाला और एक धारा पृथ्वी पर छोड़ दी, गंगा का उदगम गोमुख से है. गंगोत्री तीर्थस्थान बन गया है. देवप्रयाग में भागीरथी अलकनंदा से मिलती है और यहीं से इसे गंगा कहा जाता है. हरिद्वार आते ही गंगा मैदान में उतरती है. हरिद्वार से यात्रा करती हुई प्रयाग में गंगा यमुना का संगम होता है. काशी में भी गंगा कि बड़ी महिमा गायी जाती है, कई संतों ने गंगा के तट पर तपस्या की, जिस शहर से भी गंगा बहती गयी वे पवित्र तीर्थ बन गए. इस नदी के कारण लोगों को रोजगार मिला. पहाड़ों की उपजाऊ मिटटी को अपने साथ बहा ले जाती है और मैदानों को उपजाऊ और हरी भरी बनती है. जब नदी पश्चिम बंगाल पहुँचती है, चैतन्य महाप्रभु की जन्मस्थली (नादिया) एक तीर्थस्थल है, यहाँ से गंगा का नाम हुगली पड़ जाता है. गंगा को देवनदी, सुरसरि, तरंगिणी, विष्णुपदी, हरिनदी,मन्दाकिनी, भागीरथी आदि कहते हैं. तुलसीदासजी ने कहा " दरस परस अस मज्जन पाना , कतहीं पाप कह वेद पुराना". गंगा के किनारे अनंत महर्षि-मुनियों ने तपस्या की है, आश्रम बनाये हैं. गंगा ज्ञान भूमि है. गंगा अतुलनीय है. धार्मिक दृष्टि से गंगा का पानी हर शुभ कार्य में प्रयुक्त होता है. जब व्यक्ति दुनिया छोड़ कर जा रहा होता है और अंतिम सांस ले रहा होता है तब भी गंगाजल ही मुहं में डालते हैं. वैज्ञानिक दृष्टि से भी गंगा का पानी कई दिनों तक दूषित नहीं होता कीटाणु पैदा नहीं होते, गंगा को हम "माँ" कह कर पुकारते हैं. महाभारत के व्रत्निष्ठ, चारित्यसंपन्न, तत्वज्ञ, द्रिन्ध्प्रतिग्य भीष्म पितामह की जननी "गंगा" को ही माना गया है. गंगा मोक्षदायिनी, पतितपविनी , पापनाशिनी, पुण्यदायिनी है.गंगा स्नान इसीलिए किया जाता है. गंगा दशहेरा मनाया जाता है. अगर गंगा न होती तो भारत कैसा होता ? जहाँ गंगा है वहीँ भारत है, गंगा पवित्रं है. स्नान करने से पाप कटते हैं. आचमन से पवित्रता प्राप्त होती है. देवनदी गंगा भारत की संस्कृति का एक अभिन्न अंग है. हमारे धर्मग्रन्थ वेदपुराण, उपनिषद माँ गंगा की महिमा से भरे पड़े हैं. मगर आज हमने इतनी पवित्र व् उपयोगी नदी माँ गंगा को उसके उद्गमस्थल गोमुख से लेकर गंगासागर तक इतना प्रदूषित कर दिया है की गंगा का धवल पवित्र चेहरा कुरूप हो गया है. जगह जगह पौलेथिन के ढेर, सड़े गले फूलों और फलों के ढेर,अस्थियों के ढेर , शव विसर्जन, मरे हुए जानवर, ड्रेनेज व् सिवरेज की निकासी, यहाँ तक की साधू सन्यासियों के आश्रमों की गन्दगी भी गंगा माँ में जा रही है. कारखानों के गंदे पानी की निकासी भी गंगा में ही जा रही है. बुद्धिजीवी लोग सिर्फ गंगा के बारे में बड़े बड़े सेमिनार आयोजित करते हैं. प्रसिद्दि पाने के लिए कई तरह के हत्कंडे अपनाते हैं. लेकिन सचमुच की चिंता किसी को नहीं है, कोल्कता, इलाहबाद, बनारस, कानपूर, पटना जितने भी शहर हैं, अपनी सारी गंदगी इसे मान गंगा को समर्पित कर रहे हैं. गंगा मैय्या ने कई शहेरों को तीर्थ बनाया , प्रसिद्दि दी , उपजाऊ बनाया और शेहेरों ने उसके बदले गंगा मैय्या को ज़हर दिया गंदगी के रूप में. सरकार को भी इस पतित पाविनी गंगा पर ज्यादा चेद्द्चाद्द नहीं करनी चाहिए.गंगा की सहायक नदियों पर छोटे छोटे बांध बनाये जायें, जिससे ऊर्जा प्राप्त हो. हमारे देश मई गंगा यमुना के आलावा कई छोटी बड़ी नदियाँ हैं. पहाड़ों में प्राचीन पद्धति से चलने वाली पानी की चक्कियां (घराट) चलने पर जोर व् प्रोत्साहन देना चाहिए जिससे गाँव वाले अनाज पिसवाने बिजली की चक्की पर न जायें और उनकी समस्या गाँव में ही सुलझ जाये. इससे कुछ हद तक ऊर्जा की समस्या हल होगी. पवन ऊर्जा, सौरुर्जा को प्रोत्साहित किया जाये.लोगों की धार्मिक भावनाओं को भी आह़त न किया जाये. धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से शुद्ध व् कित्तानुराहित इस गंगा नदी का सरंक्षण किया जाये., कहीं ये विलुप्त न हो जाये.विदेशी प्रयटक भी गंगा के किनारे बसे तीर्थों में आते हैं. महत्व और उपयोगिता बताने के लिए आवश्यक दिशानिर्देश पूरे देश में हर जगह सार्वजानिक स्थानों पर लिखे होने चाहिए, इन्हें बड़े बड़े बैनर्स पर लिखा जाए. बड़ी बड़ी कंपनियों को यह निर्देश दिया जाये कि वे तब तक अपने वस्तुओं के बैनर्स नहीं लगा सकते जब तक उसमे गंगा कि पवित्रता कायम रखने का उदघोष न हो. आने वाले पीड़ी हमे कभी माफ़ नहीं करेगी. अगर हम गंगा को प्रदूषित करते रहे तो पता नहीं उसका अस्तित्व रहे या न रहे. गंगा में आक्सीजन की मात्रा भी कम होती जा रही है, ज़हरीली गसेस पनप रही हैं. हर व्यक्ति अगर सचमुच ही धार्मिक है और "गंगा मैय्या की जय" बोलता है तो वो अपनी माँ पर थूकता क्यों है?क्यों उसमे गंदे नाले घरों की गंदगीं, सिवरेज पायिप्स छोड़ता है? अगर गंगा स्नान करना है तो सभी के लिए स्वच्छ पानी चाहिए. हर व्यक्ति का फ़र्ज़ है की वह अपने स्तर पर गंगा को साफ़ रखे और सरकार पर ही निर्भर न रहे. यहाँ तक की धार्मिक क्रिया कलापों का जो भी अवशेष( यज्ञ अनुष्ठान पूजा आदि के फूल) बचता है, तो अपने बाघ बगीचे में गाढ़ दे, इस्ससे ज़मीन उपजाऊ ही बनेगी. हमने गंगा को पवित्रता के साथ तो जोड़ा अगर इस को प्रदूषित करते रहे, लोगों को कोसते रहे पर अपने पर ध्यान नहीं दिया.आज हमारी पवित्र गंगा के प्रति श्रधा यही होगी कि हम गंगा को पवित्र बनाये रखें और संकल्प लेकर अमल करें.गोमुख के अस पास निरंतर यात्रियों कि आवाजाही रहती है जिससे वहां के पारिस्थिकितंत्र को नुकसान पहुँच रहा है, इसलिए यात्रियों के जाने पर पाबंधी लगायी जाये.वृक्षारोपण को धरम के साथ जोड़ा जाए. प्रदुषण रहित उद्योग पहाड़ी छेत्रों में लगाये जायें जिससे वहां के लोगों को रोजगार मिलेगा.
अंत में सुमित्रानंदन पन्त जी कि कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं.

" सकत शय्या पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म विरल लेती है श्रांत कालान्त निश्चल, तापस बाला गंगा निर्मल, शशिमुख से दीपित मृदु करतल लहरें उर पर कोयल कुंतल"

No comments: